Last Updated on January 24, 2026 11:41 pm by BIZNAMA NEWS

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दुनिया भर में, कृत्रिम बुद्धिमता (AI) के तेज़ी से बढ़ते प्रयोग ने बिजली ग्रिड पर भारी दबाव डाल दिया है. बहुत से विशेषज्ञों का मानना है कि बिजली की इस बढ़ती माँग को पूरा करने और जलवायु संकट को और अधिक गहराने से रोकने के लिए, परमाणु ऊर्जा का बड़े पैमाने पर विस्तार ज़रूरी होगा.

वैश्विक स्तर पर बिजली की माँग बेहद तेज़ी से बढ़ रही है. अनुमान है कि 2035 तक इस मांग में 10 हज़ार टैरावॉट प्रति घंटे से अधिक की वृद्धि होगी, जो आज सभी विकसित अर्थव्यवस्थाओं की कुल बिजली खपत के बराबर है.

एआई के तेज़ी से विस्तार में इसकी बड़ी भूमिका है. एआई तकनीक, डेटा केन्द्रों पर निर्भर करती है, और एक मध्यम आकार का डेटा केन्द्र जितनी बिजली खपत करता है, उतनी बिजली खपत, लगभग 1 लाख घर मिलकर करते हैं.

अन्तरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, 2023 से 2024 के बीच डेटा केन्द्रों की बिजली माँग में, 75 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है. 

अनुमान है कि 2030 तक विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बिजली माँग में होने वाली कुल वृद्धि का 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा, अकेले डेटा केन्द्रों से आएगा.

अमेरिका में दुनिया की कई प्रमुख एआई कम्पनियाँ स्थित हैं. यहाँ इस दशक के अन्त तक एआई-आधारित डेटा प्रोसेसिंग की बिजली खपत एल्यूमिनियम, स्टील, सीमेंट और रसायन उद्योगों की संयुक्त बिजली खपत से भी अधिक होने का अनुमान है.

इसी सन्दर्भ में, दिसम्बर 2025 में दुनिया भर के नीति-निर्माता, तकनीकी कम्पनियाँ और परमाणु ऊर्जा उद्योग के नेता, वियना स्थित IAEA के मुख्यालय में एकत्र हुए थे.

इस बैठक में, एआई के विस्तार के लिए परमाणु ऊर्जा की सम्भावनाओं और परमाणु उद्योग में नवाचार को गति देने में एआई की भूमिका पर चर्चा हुई.

अत्याधुनिक एआई मॉडलों को प्रशिक्षित करने के लिए लाखों केन्द्रीय प्रसंस्करण इकाइयों (CPU) को, सप्ताहों और महीनों तक बिना रुके लगातार चलाना पड़ता है.

इसके साथ ही, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दैनिक इस्तेमाल अब केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि अस्पतालों, सार्वजनिक प्रशासन, परिवहन, कृषि, संचालन और शिक्षा जैसे लगभग सभी क्षेत्रों में इसका तेज़ी से विस्तार हो रहा है.

हर सवाल, हर गतिविधि और हर सिफ़ारिश (recommendation)  बिजली की खपत करती है.

आयरलैंड में स्थित एक डेटा सेंटर.

© Unsplash/Geoffrey Moffett आयरलैंड में स्थित एक डेटा केन्द्र.

एआई पर काम कर रहे गूगल के वरिष्ठ प्रबन्धक मैनुएल ग्राइसिंगर कहते हैं, “हमें ऐसी स्वच्छ, स्थिर और शून्य-कार्बन बिजली की ज़रूरत है, जो 24 घंटे उपलब्ध हो.”

उनके अनुसार, “यह निस्सन्देह एक बेहद बड़ी चुनौती है, जिसे केवल पवन और सौर ऊर्जा के ज़रिये पूरा करना सम्भव नहीं है. एआई भविष्य का इंजन है, लेकिन ईंधन के बिना कोई भी इंजन लगभग बेकार होता है. परमाणु ऊर्जा केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य की ऊर्जा संरचना का एक अनिवार्य और केन्द्रीय घटक है.”

परमाणु उद्योग में उत्साह

IAEA के महानिदेशक रफ़ाएल मारियानो ग्रॉस्सी भी, गूगल के मैनुएल ग्राइसिंगर की राय से सहमत हैं. 

मारियानो ग्रॉस्सी का मानना है कि परमाणु उद्योग एआई क्रान्ति का ऊर्जा भागीदार बनेगा. “केवल परमाणु ऊर्जा ही 5 ज़रूरतों को पूरा कर सकती है: कम-कार्बन उत्पादन, 24 घंटे विश्वसनीयता, अति-उच्च पावर सघनता, ग्रिड स्थिरता और असली विस्तार क्षमता.”

परमाणु ऊर्जा से जुड़ा वातावरण उत्साहपूर्ण दिखाई दे रहा है. वर्तमान में, विश्वभर में 441 रिएक्टर काम कर रहे हैं, जबकि 71 नए रिएक्टर निर्माणाधीन हैं.

इनमें से अमेरिका में 10 और रिएक्टर बनने वाले हैं, जो पहले से 94 संयंत्रों का घर है. ये किसी भी देश में सबसे अधिक हैं.

डेटा केन्द्रों का उपयोग कर रही तकनीकी दिग्गज कम्पनियों ने, 2050 तक वैश्विक परमाणु ऊर्जा क्षमता को कम से कम तीन गुना बढ़ाने के लक्ष्य का समर्थन करने की प्रतिबद्धता जताई है.

उदाहरण के लिए, माइक्रोसॉफ़्ट ने अमेरिका के पैन्सिल्वेनिया में, थ्री माइल आइलैंड परमाणु ऊर्जा संयंत्र की यूनिट -1 को फिर से शुरू करने के लिए, 20 साल का बिजली ख़रीद समझौता किया.

दुनिया भर में एआई की वृद्धि के कारण, सक्रिय रूप से परमाणु ऊर्जा में निवेश सम्बन्धी गतिविधियाँ बढ़ रही हैं. 

मारियानो ग्रॉस्सी के अनुसार, “योरोप में, दुनिया के सबसे घने डिजिटल कॉरिडोर हैं, जिनमें फ्रैंकफ़र्त, ऐम्टर्डम और लन्दन प्रमुख केन्द्र हैं.”

उन्होंने कहा कि “फ़्रांस और ब्रिटेन जैसे पारम्परिक परमाणु ऊर्जा वाले देश, परमाणु ऊर्जा निर्माण में अपनी हिस्सेदारी दोगुनी कर रहे हैं, जबकि पोलैंड जैसे उभरते देश भी इसमें तेज़ी से अपनी भागेदारी बढ़ा रहे हैं.”

रूस, गणित और कम्प्यूटर विज्ञान में मज़बूत शोध के लिए जाना जाता है. यह, विश्व का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा निर्यातक बना हुआ है और उन्नत रिएक्टर तकनीक का प्रमुख संचालक और विकासकर्ता है.

अन्तरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, 2023 से 2024 के बीच डेटा केन्द्रों की बिजली माँग में 75 प्रतिशत से ज़्यादा की वृद्धि हुई है.

वहीं, चीन एआई और परमाणु ऊर्जा दोनों में बड़ी सफलता हासिल कर रहा है.

यूएन परमाणु एजेंसी के प्रमुख का कहना है, “एआई तकनीक और एआई डेटा केन्द्रों का निर्माण समानांतर रूप से आगे बढ़ रहा है, और इसी अवधि में दुनिया में नए परमाणु रिएक्टरों की सँख्या भी विश्व में प्रथम स्थान पर है.”

जापान, बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए डेटा केन्द्र बनाने और उन्हें नवीन बनाने में भारी निवेश कर रहा है.

जबकि मध्य पूर्व में, संयुक्त अरब अमीरात ने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम स्थापित किया है और यह क्षेत्रीय एआई हब के रूप में उभर कर सामने आया है.

क्या छोटे रिएक्टर समाधान हैं?

दुनिया भर में, तुरन्त और अधिक ऊर्जा की आवश्यकता छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) के निर्माण को भी बढ़ावा दे रही है, जो पारम्परिक बड़े ऊर्जा संयंत्रों से बहुत अलग हैं. इनमें भारी निवेश और लगभग 10 साल का निर्माण समय लगता है.

राफ़ाएल मारियानो ग्रॉस्सी कहते हैं कि “इन रिएक्टरों का आकार छोटा होता है, सुरक्षा प्रणाली उन्नत होती है, और इन्हें नज़दीकी औद्योगिक क्षेत्रों, जैसे डेटा केन्द्र परिसर में भी लगाया जा सकता है.”

इनका प्रयोग करने वाली तकनीकी कम्पनियों को, क्षेत्रीय ग्रिड की आपूर्ति या प्रेषण के दौरान हानि की चिन्ता नहीं करनी पड़ती. यह उन क्षेत्रों में एक निर्णायक लाभ होगा, जहाँ ग्रिड उन्नयन धीमा है और कनेक्शन की लम्बी क़तारें हैं.

हालाँकि, इस प्रकार के रिएक्टर को अब भी अनुसन्धान और विकास (R&D) चरण से आगे बढ़ने की आवश्यकता है.

IAEA, नियामकों और उद्योग के साथ मिलकर, उन्हें व्यावहारिक बनाने पर काम कर रहा है.

उदाहरण के लिए, गूगल ने एक ऊर्जा कम्पनी के साथ कई छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर से, परमाणु ऊर्जा ख़रीदने का समझौता किया है, जो वैश्विक स्तर पर पहली बार हुआ है. यदि सब कुछ ठीक रहा, तो ये 2030 तक संचालन में आ सकते हैं.

गूगल, अब अन्तरिक्ष की ओर भी ध्यान दे रहा है, और उसकी कक्षा यानि Orbit में बड़े पैमाने पर मशीन लर्निंग के लिए अन्तरिक्ष-आधारित सौर नैटवर्क की सम्भावना का पता लगा रहा है.

इससे अप्रतिबन्धित सौर ऊर्जा का पूरा लाभ उठाया जा सकेगा. साथ ही, दो प्रोटोटाइप उपग्रह 2027 के शुरू में छोड़े जाने हैं, ताकि अन्तरिक्ष वातावरण में विकिरण सहनशीलता और डेटा प्रोसेसिंग क्षमता का परीक्षण किया जा सके.

चाहे अन्तरिक्ष में सौर ऊर्जा का उपयोग करना हो, पुराने रिएक्टरों को फिर से चालू करना हो, नए छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर में निवेश करना हो, या बड़े रिएक्टर का निर्माण करना हो… सभी प्रयास एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं.

इसका लक्ष्य, भविष्य में लोगों की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए, बड़े पैमाने पर परमाणु ऊर्जा पर आधारित एक स्थिर और टिकाऊ ऊर्जा प्रणाली का निर्माण करना है.

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