Last Updated on March 6, 2026 5:56 pm by BIZNAMA NEWS

आर. सूर्यमूर्ति द्वारा
भारत के घरों में शाम का दृश्य आज भी वही है: चूल्हे पर पकती दाल, फूलती रोटियां और परोसने के लिए तैयार चावल। लेकिन इस साधारण ‘रोजाना की थाली’ के पीछे एक ऐसी कहानी छिपी है जो स्थानीय मंडियों से शुरू होकर फारस की खाड़ी (Persian Gulf) के युद्धग्रस्त क्षेत्रों तक जाती है।
क्रिसिल (CRISIL) के मासिक सूचकांक के अनुसार, फरवरी में घर में बनी शाकाहारी थाली की कीमत पिछले साल की तुलना में काफी हद तक स्थिर रही। जहां फसल की देरी के कारण टमाटर की कीमतों में 43% का उछाल आया (कीमत ₹33/किग्रा तक पहुंच गई), वहीं प्याज की कीमतों में 24% और आलू में 13% की गिरावट ने इस बोझ को कम कर दिया।
लेकिन अब भारत की थाली का सीधा संबंध वैश्विक राजनीति से जुड़ गया है। 2026 के ईरान युद्ध ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के माध्यम से होने वाले व्यापार पर अनिश्चितता के बादल मंडरा दिए हैं।
निर्यात पर प्रभाव:
- बासमती चावल: भारत के कुल बासमती निर्यात का 18% हिस्सा अकेले ईरान जाता है। खाड़ी देशों में बढ़ते जोखिम और बीमा प्रीमियम में बढ़ोतरी के कारण हरियाणा के करनाल जैसे जिलों के निर्यातक अब सावधानी बरत रहे हैं।
- मध्य पूर्व का बाजार: भारत के आधे से अधिक बासमती निर्यात को मध्य पूर्व के देश खरीदते हैं। खाड़ी में किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर भारतीय किसानों की आय पर पड़ता है।
- गैर-बासमती चावल: यह क्षेत्र काफी हद तक सुरक्षित है क्योंकि इसका मुख्य निर्यात अफ्रीकी देशों को अलग समुद्री मार्गों से किया जाता है।
क्रिसिल इंटेलिजेंस के निदेशक पुशन शर्मा के अनुसार, पश्चिम एशिया की अनिश्चितता अल्पावधि में बासमती की मांग को कम कर सकती है। फिलहाल, भारतीय रसोई इस संकट से तालमेल बिठा रही है—महंगे टमाटर की जगह दही या इमली का इस्तेमाल हो रहा है—लेकिन दुनिया की नजरें फारस की खाड़ी के हालातों पर टिकी हैं।



