Last Updated on January 24, 2026 11:53 pm by BIZNAMA NEWS

AMN / UN NEWS
संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट कहती है कि बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं, व्यापार बाधाओं और ऊँचे क़र्ज़ के जोखिमों के बावजूद, दक्षिण और पूर्वी एशिया की अर्थव्यवस्थाओं में, आने वाले वर्षों में आर्थिक वृद्धि बनी रहने की उम्मीद है. घरेलू मांग को सहारा देने वाली नीतियाँ, इन क्षेत्रों को वैश्विक दबावों से निपटने में मदद कर रही हैं.
विश्व आर्थिक स्थिति और सम्भावनाएँ 2026 रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशिया का सकल घरेलू उत्पाद 2026 में 5.6 प्रतिशत और 2027 में 5.9 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है. 2025 में यह वृद्धि दर लगभग 5.9 प्रतिशत रही थी.
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, मजबूत निजी उपभोग और सार्वजनिक निवेश इस क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को सहारा दे रहे हैं.
वहीं, पूर्वी एशिया में 2026 के लिए आर्थिक वृद्धि 4.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो 2025 में 4.9 प्रतिशत थी.
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका द्वारा शुल्क (Tarrif) बढ़ाए जाने से पहले निर्यात में आई अस्थाई तेज़ी अब कम हो रही है, लेकिन सहायक मौद्रिक और वित्तीय नीतियों के कारण घरेलू मांग के मज़बूत बने रहने की उम्मीद है.
वैश्विक स्तर पर, 2026 में आर्थिक वृद्धि 2.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो महामारी से पहले के औसत से काफ़ी कम है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि निवेश की धीमी गति और सीमित वित्तीय संसाधन, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल रहे हैं. इसके बावजूद, दक्षिण और पूर्वी एशिया अन्य क्षेत्रों की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करते नज़र आ रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश के अनुसार, आर्थिक, भू-राजनैतिक और तकनीकी तनाव दुनिया भर में नई चुनौतियाँ पैदा कर रहे हैं, जिससे अनिश्चितता और सामाजिक असुरक्षा बढ़ रही है.
उन्होंने कहा है कि कई विकासशील देश अब भी गम्भीर दबाव में हैं और सतत विकास लक्ष्यों की ओर बढ़ने की गति धीमी बनी हुई है.
© UN India/Blassy Boben Jose
भारत के लिए संयुक्त राष्ट्र के देशीय अर्थशास्त्री क्रिस्टोफ़र गैरोवे, विश्व आर्थिक स्थिति और सम्भावनाएँ 2026 रिपोर्ट के विमोचन पर.
भारत, चीन और क्षेत्रीय परिदृश्य
रिपोर्ट के अनुसार, भारत की आर्थिक वृद्धि 2025 में अनुमानित 7.4 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2026 में 6.6 प्रतिशत रहने की सम्भावना है.
घरेलू खपत, मज़बूत सार्वजनिक निवेश और ब्याज़ दरों में नरमी से, आर्थिक गतिविधियों को सहारा मिलने की उम्मीद है. हालाँकि, संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा लगाए गए कुछ व्यापार शुल्क भारत के कुछ निर्यात क्षेत्रों को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन अन्य बड़े बाज़ारों से मज़बूत मांग जारी रहने से, यह प्रभाव कुछ हद तक सन्तुलित हो सकता है.
पूर्वी एशिया में, चीन की अर्थव्यवस्था 2026 में 4.6 प्रतिशत और 2027 में 4.5 प्रतिशत की दर से बढ़ने की सम्भावना है.
अमेरिका के साथ व्यापार तनाव में अस्थाई कमी से कारोबारी भरोसा बेहतर हुआ है, जबकि सहायक नीतियाँ घरेलू मांग को बनाए रखने में मदद कर रही हैं.
दक्षिण एशिया के कई देशों में महँगाई में साफ़ कमी देखी गई है. ज़्यादातर देशों में क़ीमतें केन्द्रीय बैंकों के तय लक्ष्यों या सामान्य स्तर के आसपास बनी हुई हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, पूरे क्षेत्र में औसत महँगाई 2026 में 8.7 प्रतिशत तक बढ़ सकती है. नेपाल में महँगाई 3.2 प्रतिशत और भारत में 4.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि ईरान में यह बढ़कर 35.4 प्रतिशत तक पहुँच सकती है.

© UNICEF/Kongchan Phiennachit
दक्षिणपूर्व एशिया में हाल के समय में अच्छी आर्थिक व सामाजिक प्रगति हुई है, मगर बढ़ते समुद्री जल स्तर, बाढ़ों और मौसम की अत्यन्त चरम घटनाओं ने विपरीत प्रभाव भी डाला है.
क़र्ज़, जलवायु और जोखिम
रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि दक्षिण एशिया के कई देशों में उच्च सरकारी क़र्ज़, नीतियाँ बनाने की क्षमता को सीमित कर रहा है. सरकारों के लिए, सीमित वित्तीय संसाधनों के कारण बाहरी झटकों से निपटना और विकास को सहारा देना चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
वैश्विक व्यापार नीतियों को लेकर अनिश्चितता और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सम्भावित मन्दी भी क्षेत्र के लिए जोखिम बढ़ा सकती है.
इसके अलावा, बाढ़, सूखा और चरम मौसम जैसी जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाएँ, दक्षिण एशिया की आर्थिक स्थिरता के लिए बढ़ता ख़तरा बनी हुई हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, इन जोखिमों से निपटने के लिए आर्थिक और विकास नीतियों के बीच बेहतर तालमेल ज़रूरी है.
नीतिगत दिशा और सहयोग
रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण और पूर्वी एशिया के अधिकांश केन्द्रीय बैंकों ने 2025 में महँगाई कम होने के बाद मौद्रिक नीतियों में ढील दी है. यह रुझान 2026 में भी जारी रह सकता है, हालाँकि हर देश में इसका स्वरूप अलग होगा.
साथ ही, कई देश सार्वजनिक वित्त को मज़बूत करने के लिए राजकोषीय सुधारों पर ध्यान दे रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने देशों के बीच सहयोग को फिर से मज़बूत करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है. बदलते व्यापार हालात, जलवायु जोखिमों और वित्तीय दबावों के इस दौर में आपसी भरोसा बहाल करना और खुले, नियमों पर आधारित वैश्विक तंत्र को मज़बूत करना बेहद ज़रूरी बताया गया है.





