स्टार्ट-अप इंडिया के दस साल: उम्मीदों और हकीकत के बीच

Last Updated on January 18, 2026 5:15 pm by BIZNAMA NEWS

— अन्दलीब अख़्तर

जब भारत सरकार ने 2016 में स्टार्ट-अप इंडिया की शुरुआत की, तो इसे केवल एक सरकारी योजना नहीं बल्कि सोच में बदलाव के रूप में पेश किया गया था। दावा था कि युवा अब केवल नौकरियों की तलाश करने वाले नहीं रहेंगे, बल्कि उद्यमिता के ज़रिये रोजगार पैदा करने वाले बनेंगे और आर्थिक बदलाव के वाहक होंगे। जनवरी 2026 में, इस पहल के दस वर्ष पूरे होने पर जश्न से अधिक आत्ममंथन की ज़रूरत महसूस होती है।

सरकारी आँकड़े पहली नज़र में प्रभावशाली लगते हैं। दिसंबर 2025 तक उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) द्वारा मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप्स की संख्या दो लाख से अधिक बताई जाती है। बेंगलुरु, दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और हैदराबाद जैसे शहर इस पारिस्थितिकी तंत्र के केंद्र बने हैं, जबकि लगभग आधे स्टार्ट-अप्स के टियर-2 और टियर-3 शहरों से आने का दावा किया जाता है। कागज़ पर यह व्यापक उद्यमिता का संकेत देता है।

लेकिन सवाल केवल संख्या का नहीं है। असली प्रश्न यह है कि इन स्टार्ट-अप्स में से कितने टिकाऊ साबित हुए, कितनों ने स्थायी व्यवसाय खड़े किए और कितनों ने ऐसे रोजगार पैदा किए जो सिर्फ तात्कालिक आय नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा भी प्रदान करते हों।

भारतीय स्टार्ट-अप परिदृश्य में विफलता की दर अब भी ऊँची है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। बड़ी और चर्चित कंपनियाँ बार-बार निवेश आकर्षित कर लेती हैं, जबकि हज़ारों छोटे और स्थानीय समस्याओं पर काम करने वाले उद्यम पूंजी तक पहुँच से वंचित रह जाते हैं। तीन से पाँच वर्षों के भीतर बड़ी संख्या में स्टार्ट-अप्स का बंद हो जाना इस असंतुलन को उजागर करता है।

नवाचार के दावे पर भी गंभीर नज़र डालना ज़रूरी है। निवेश का बड़ा हिस्सा ई-कॉमर्स, फूड डिलीवरी, फिनटेक और उपभोक्ता ऐप्स तक सीमित रहा है। इन क्षेत्रों ने सुविधा और डिजिटल पहुँच ज़रूर बढ़ाई है, लेकिन वे अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता को मज़बूत करने में सीमित भूमिका निभाते हैं। विनिर्माण, कृषि तकनीक, डीप-टेक, बायोटेक और जलवायु समाधान जैसे क्षेत्र — जो दीर्घकालिक विकास के लिए निर्णायक हैं — अपेक्षित ध्यान नहीं पा सके।

रोजगार सृजन की तस्वीर भी मिश्रित है। लाखों अवसर पैदा हुए हैं, लेकिन इनमें से बड़ी संख्या गिग इकॉनमी से जुड़ी है, जहाँ न सामाजिक सुरक्षा है और न ही रोजगार की स्थिरता। लचीले काम को टिकाऊ आजीविका का विकल्प मान लेना एक खतरनाक भ्रम हो सकता है, और यही वह मुद्दा है जिस पर अब गंभीर नीति-स्तरीय बहस की ज़रूरत है।

सरकार ने फंड ऑफ फंड्स, सीड फंड योजना, क्रेडिट गारंटी और अटल इनोवेशन मिशन जैसे उपायों के माध्यम से सहयोग देने का प्रयास किया है। इसके बावजूद छोटे शहरों के उद्यमियों के लिए जटिल प्रक्रियाएँ, इनक्यूबेटरों की असमान गुणवत्ता और प्रभावी मेंटरशिप की कमी अब भी बड़ी बाधाएँ हैं। कई युवा उद्यमियों के लिए सिस्टम तक पहुँच ही एक चुनौती बनी हुई है।

महिला भागीदारी के मोर्चे पर कुछ प्रगति अवश्य हुई है। लगभग 45 प्रतिशत स्टार्ट-अप्स में कम से कम एक महिला निदेशक होने का दावा किया जाता है। लेकिन निवेश के आँकड़े बताते हैं कि महिला-नेतृत्व वाले स्टार्ट-अप्स को अब भी बेहद कम पूंजी मिलती है। भागीदारी बढ़ना सकारात्मक संकेत है, मगर समान अवसर अभी भी दूर की बात है।

दस वर्षों के बाद स्टार्ट-अप इंडिया ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसे आत्मप्रशंसा से आगे बढ़कर आत्ममूल्यांकन की ज़रूरत है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने सोच बदली है। लेकिन सोच बदलने के बाद अर्थव्यवस्था को बदलने के लिए ऐसे संस्थागत ढांचे चाहिए जो संख्या के बजाय गुणवत्ता, त्वरित मुनाफे के बजाय दीर्घकालिक मूल्य और नकल के बजाय वास्तविक नवाचार को प्राथमिकता दें।

अगले दशक में यदि यह पहल सचमुच ऐतिहासिक बनना चाहती है, तो उसे पंजीकरण और फंडिंग के आँकड़ों से आगे देखना होगा। असली कसौटी यह होगी कि स्टार्ट-अप कितनी मज़बूत संस्थाएँ बन पाते हैं और उनका प्रभाव आम नागरिक के जीवन में कितना महसूस होता है। क्योंकि किसी भी क्रांति की सफलता सुर्खियों से नहीं, बल्कि ज़मीनी बदलाव से आँकी जाती है।

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