Last Updated on July 13, 2026 1:32 am by BIZNAMA NEWS
संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट बताती है कि युवा परिवार से दूर नहीं हुए हैं, बल्कि महंगाई, अस्थिर रोजगार और बढ़ती जीवन-यापन लागत उनके सपनों के बीच सबसे बड़ी बाधा बन गई है।
अंदलीब अख्तर
दुनिया भर में घटती जन्मदर को अक्सर इस रूप में प्रस्तुत किया जाता है मानो नई पीढ़ी ने शादी, परिवार और बच्चों से मुंह मोड़ लिया हो। युवाओं पर यह आरोप भी लगाया जाता है कि वे पारिवारिक जीवन की बजाय करियर, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुविधाओं को अधिक महत्व देने लगे हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की ताज़ा वैश्विक रिपोर्ट इस धारणा से बिल्कुल अलग और कहीं अधिक जटिल तस्वीर पेश करती है।
रिपोर्ट का स्पष्ट निष्कर्ष है कि दुनिया के अधिकांश युवा आज भी शादी करना, जीवनसाथी के साथ परिवार बसाना और बच्चों का पालन-पोषण करना चाहते हैं। समस्या उनकी इच्छाओं में नहीं, बल्कि उन आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों में है जो इन इच्छाओं को पूरा करने के लिए आवश्यक हैं।
73 देशों और क्षेत्रों के 1.08 लाख से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ताओं पर आधारित इस सर्वेक्षण के अनुसार, 88 प्रतिशत युवाओं का मानना है कि शादी और बच्चों के लिए आर्थिक सुरक्षा सबसे पहली आवश्यकता है। वहीं 87 प्रतिशत ने स्थायी रोजगार को जरूरी बताया, जबकि 85 प्रतिशत का कहना है कि विवाह और माता-पिता बनने से पहले मानसिक एवं भावनात्मक रूप से तैयार होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
ये आंकड़े केवल युवाओं की प्राथमिकताएं नहीं बताते, बल्कि उस आर्थिक असुरक्षा को भी उजागर करते हैं जिसमें आज की पीढ़ी अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने को मजबूर है।
“लाइफ, चॉइस एंड फ्यूचर: व्हाट यंग पीपल वांट एंड द फैक्टर्स शेपिंग देयर रिलेशनशिप एंड पैरेंटहुड डिसीजन्स” शीर्षक वाली इस रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है—यदि युवा परिवार चाहते हैं, तो दुनिया के अनेक देशों में विवाह देर से क्यों हो रहे हैं और जन्मदर लगातार क्यों घट रही है?
इसका उत्तर सीधे-सीधे आर्थिक परिस्थितियों में छिपा है।
आज स्थायी नौकरी पाना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो गया है। महानगरों में घर खरीदना तो दूर, किराया देना भी युवाओं की आय का बड़ा हिस्सा निगल जाता है। उच्च शिक्षा लगातार महंगी हो रही है, बच्चों के पालन-पोषण का खर्च बढ़ता जा रहा है और अस्थायी रोजगार ने भविष्य की योजना बनाना बेहद कठिन बना दिया है। ऐसे माहौल में विवाह और माता-पिता बनने का फैसला केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक निर्णय बन जाता है।
भारत में चुनौती और भी गहरी
भारत में परिवार और विवाह आज भी सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार हैं, लेकिन तेजी से बदलती आर्थिक परिस्थितियों ने युवाओं के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और अन्य महानगरों में बढ़ती आवास लागत, रोजगार की अनिश्चितता, लंबे कार्य घंटे और बच्चों की शिक्षा व देखभाल का बढ़ता खर्च युवा दंपतियों के निर्णयों को प्रभावित कर रहा है।
भारत में एक विरोधाभास भी साफ दिखाई देता है। एक ओर युवाओं पर समय पर शादी करने का सामाजिक और पारिवारिक दबाव होता है, वहीं दूसरी ओर उनसे विवाह के बाद उच्च जीवन स्तर बनाए रखने की भी अपेक्षा की जाती है। अपना घर, कार, बच्चों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आर्थिक स्थिरता को सफल पारिवारिक जीवन का पैमाना बना दिया गया है। परिणामस्वरूप, अनेक युवा विवाह करना चाहते हुए भी उसे टालने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
महिलाओं के लिए स्थिति और जटिल
महिलाओं के लिए यह चुनौती और भी अधिक है। शिक्षा और रोजगार में उनकी बढ़ती भागीदारी ने उन्हें अपने जीवन के फैसले लेने का अधिकार तो दिया है, लेकिन घरेलू जिम्मेदारियों का समान बंटवारा उसी गति से नहीं बढ़ा है।
कई महिलाओं के लिए मां बनने का निर्णय केवल बच्चे की इच्छा का विषय नहीं है। उनके सामने यह सवाल भी होता है कि क्या जीवनसाथी बच्चों की परवरिश और घरेलू जिम्मेदारियों में बराबरी से भागीदारी करेगा? क्या कार्यस्थल पर मातृत्व के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध होंगी? क्या मातृत्व के बाद उनके करियर पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा?
युवाओं की प्राथमिकता परिवार ही है
रिपोर्ट इस धारणा को भी खारिज करती है कि युवा अब बच्चे नहीं चाहते। सर्वेक्षण में शामिल लगभग दो-तिहाई लोगों ने विवाह को अपने आदर्श जीवन का हिस्सा बताया, जबकि बहुत कम लोगों ने कहा कि वे कभी संतान नहीं चाहते। हर दस में से आठ प्रतिभागियों ने माना कि बच्चों से मिलने वाली खुशी ही माता-पिता बनने की सबसे बड़ी प्रेरणा है।
इसके विपरीत, सरकारी प्रोत्साहन, आर्थिक लाभ या भविष्य की कार्यबल बढ़ाने जैसे राष्ट्रीय उद्देश्य युवाओं के लिए अपेक्षाकृत कम महत्व रखते हैं।
सरकारों के लिए स्पष्ट संदेश
यह निष्कर्ष दुनिया भर की सरकारों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। लोग बच्चे इसलिए पैदा नहीं करते कि भविष्य में देश को अधिक कर्मचारी, करदाता या सैनिक मिल सकें। परिवार बसाने का निर्णय मूलतः व्यक्तिगत, भावनात्मक और मानवीय आकांक्षाओं से जुड़ा होता है।
इसलिए सरकारों की भूमिका लोगों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित करना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियां तैयार करना होनी चाहिए जिनमें वे अपनी इच्छानुसार परिवार बसाने का निर्णय बिना आर्थिक भय के ले सकें।
यूएनएफपीए की कार्यकारी निदेशक डॉ. नतालिया कनेम का कहना है कि युवा अपने भविष्य और परिवार को लेकर आशावादी हैं। यदि आर्थिक बाधाएं कम हों और उन्हें स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अवसर मिले, तो वे अपने जीवन के लिए बेहतर विकल्प चुन सकते हैं।
भारत के लिए क्या सीख?
भारत सहित उन सभी देशों के लिए, जहां जनसंख्या, जन्मदर और भविष्य की कार्यशक्ति पर बहस जारी है, यह रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि केवल अधिक बच्चे पैदा करने की अपील या आर्थिक प्रोत्साहन पर्याप्त नहीं होंगे।
स्थायी और सम्मानजनक रोजगार, किफायती आवास, सस्ती एवं गुणवत्तापूर्ण बाल देखभाल, बेहतर सरकारी शिक्षा, मजबूत स्वास्थ्य सेवाएं, मातृत्व और पितृत्व अवकाश तथा कार्य और पारिवारिक जीवन के बीच संतुलन—यही वे वास्तविक उपाय हैं जो युवाओं को परिवार बसाने का विश्वास दे सकते हैं।
युवाओं के फैसले शून्य में नहीं होते। उपयुक्त जीवनसाथी मिलना, सुरक्षित आवास, स्थिर आय, बच्चों की जिम्मेदारियों का समान बंटवारा और अपने जीवन के निर्णय स्वतंत्र रूप से लेने का अधिकार—यही वे कारक हैं जो तय करते हैं कि कोई व्यक्ति कब शादी करेगा और कब माता-पिता बनने का निर्णय लेगा।
नई पीढ़ी परिवार की अवधारणा को अस्वीकार नहीं कर रही है। वह केवल यह सुनिश्चित करना चाहती है कि जिस परिवार का वह सपना देख रही है, उसे सम्मानजनक, सुरक्षित और आर्थिक रूप से स्थिर जीवन भी दे सके।
आज की जनसंख्या बहस का वास्तविक केंद्र यही होना चाहिए। सरकारों को युवाओं को यह बताने की बजाय कि उन्हें कब शादी करनी चाहिए या कितने बच्चे पैदा करने चाहिए, ऐसी आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था बनाने पर ध्यान देना चाहिए जिसमें विवाह और माता-पिता बनना आर्थिक जोखिम नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक और सुखद निर्णय बन सके।

