Last Updated on March 6, 2026 2:37 pm by BIZNAMA NEWS


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AMN / नई दिल्ली

अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) ने आज केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि सरकार की “अमेरिकी साम्राज्यवाद” के प्रति निष्ठा ने भारतीय किसानों और खेतिहर मजदूरों को बर्बादी की कगार पर धकेल दिया है। किसान सभा ने ईरान पर हो रहे हमलों को ‘अन्यायपूर्ण’ करार देते हुए मांग की है कि युद्ध से प्रभावित किसानों, निर्यातकों और श्रमिकों के लिए तत्काल एक व्यापक राहत पैकेज घोषित किया जाए।

“किसानों के खून से लिखी जा रही व्यापारिक सौदों की इबारत”

किसान सभा ने एक कड़ा बयान जारी करते हुए कहा कि जहां मुख्यधारा का मीडिया जीडीपी के आंकड़ों में उलझा है, वहीं हरियाणा के बासमती उत्पादक, सोलापुर के केला किसान और महाराष्ट्र के अंगूर की खेती करने वाले किसान इस युद्ध की भारी कीमत चुका रहे हैं। संगठन ने हाल के भारत-अमेरिका व्यापार समझौतों को “लूट का लाइसेंस” बताते हुए सरकार पर युद्ध अपराधियों का साथ देने का आरोप लगाया।

होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा से निर्यात प्रभावित

एआईकेएस के अनुसार युद्ध के कारण Strait of Hormuz में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। यह मार्ग भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के पश्चिम एशिया को होने वाले निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।

संगठन का कहना है कि भारत के लगभग 56 प्रतिशत व्यापारिक निर्यात इस समुद्री मार्ग से होकर जाते हैं। युद्ध के कारण जहाजों की आवाजाही बाधित होने से कृषि उत्पादों का निर्यात रुक गया है और लाखों टन माल बंदरगाहों या समुद्र में फंसा हुआ है।


आंकड़ों में तबाही: कृषि क्षेत्र पर संकट का स्नैपशॉट

युद्ध के कारण उपजे संकट ने भारतीय कृषि निर्यात की कमर तोड़ दी है। किसान सभा द्वारा जारी किए गए आंकड़े भयावह स्थिति को दर्शाते हैं:

उत्पादक्षति का विवरणआर्थिक प्रभाव
बासमती चावल4 लाख टन (₹3,200 करोड़) बंदरगाहों और समुद्र में फंसा।4 दिन में कीमतें 6% गिरीं; 30 लाख परिवार प्रभावित।
केला (सोलापुर)1,200 कंटेनर कोल्ड स्टोरेज में बंद।₹8,500 प्रति कंटेनर प्रतिदिन का ‘डेमरेज’ शुल्क।
अंगूर6,000 टन निर्यात के लिए तैयार माल अधर में।स्थानीय बाजारों में कौड़ियों के भाव बेचने की मजबूरी।
प्याज (नासिक)5,400 टन माल जेएनपीटी बंदरगाह पर सड़ रहा है।दुबई और खाड़ी के बाजार पूरी तरह बंद।
पोल्ट्री/अंडे80 लाख अंडे रोजाना खाड़ी देशों नहीं जा पा रहे।घरेलू बाजार में कीमतें क्रैश होने से पोल्ट्री फार्मर परेशान।
रोजगारबासमती बेल्ट में भारी छंटनी।1.6 करोड़ कार्य-दिवस (Person-days) का नुकसान।

आर्थिक और रणनीतिक मोर्चे पर दोहरी मार

युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव बढ़ने से भारत का 56% व्यापारिक निर्यात ठप हो गया है।

  • कच्चे तेल का संकट: ब्रेंट क्रूड $84 के पार पहुंच गया है। कच्चे तेल में $1 की वृद्धि भारत के आयात बिल को $2 बिलियन बढ़ा देती है।
  • रुपये की गिरावट: आरबीआई के हस्तक्षेप के बावजूद रुपया 91.82 के स्तर पर है, जिससे आयात और भी महंगा हो गया है।
  • खाद की किल्लत: तेल की कीमतों और आपूर्ति में बाधा से उर्वरक उत्पादन लागत बढ़ने की आशंका है, जिसका सीधा बोझ किसानों पर पड़ेगा।

प्रमुख मांगें: किसानों को चाहिए ‘आज’ नकद राहत

किसान सभा ने सरकार के सामने निम्नलिखित मांगें रखी हैं:

  1. प्रत्यक्ष नकद सहायता: प्रभावित क्षेत्रों के किसानों को ₹50,000 प्रति हेक्टेयर की तत्काल आपातकालीन राहत।
  2. सरकारी खरीद: नाफेड (NAFED) और भारतीय खाद्य निगम (FCI) संकट पूर्व की कीमतों पर (प्याज ₹35/किग्रा, केला ₹25/किग्रा) तुरंत खरीद शुरू करें।
  3. शुल्क माफी: बंदरगाहों पर लगने वाले सभी डेमरेज और भंडारण शुल्कों को सरकार वहन करे।
  4. कर्ज माफी: प्रभावित किसानों के सभी कृषि ऋण और ब्याज को पूर्णतः माफ किया जाए।
  5. मजदूरों के लिए कोष: काम खो चुके खेतिहर मजदूरों और पल्लेदारों को ₹10,000 प्रति माह की आर्थिक मदद दी जाए।

चेतावनी: 2020-21 से भी बड़ा होगा आंदोलन

किसान सभा ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार ने अमेरिकी दबाव में आकर भारतीय किसानों के हितों की बलि देना बंद नहीं किया, तो देश भर का किसान एक ऐसे आंदोलन के लिए मजबूर होगा जो 2020-21 के ऐतिहासिक किसान आंदोलन से भी कहीं अधिक व्यापक और आक्रामक होगा।


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