Last Updated on February 1, 2026 5:50 pm by BIZNAMA NEWS

आर. सूर्यमूर्ति
वर्ष 2026 का केंद्रीय बजट भारत की स्वास्थ्य अर्थव्यवस्था के लिए एक सटीक और लक्षित हस्तक्षेप के रूप में सामने आया है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए ₹1,06,530.42 करोड़ के आवंटन से खर्च में निरंतर वृद्धि तो दिखती है, लेकिन बजट के सूक्ष्म प्रावधानों का विश्लेषण यह संकेत देता है कि सरकार अब केवल अस्पतालों के निर्माण से आगे बढ़कर जीवन बचाने की लागत को कम करने पर केंद्रित हो रही है।
वित्तीय नब्ज: शिक्षा और नवाचार पर ज़ोर
सरकार चिकित्सा क्षेत्र की “बौद्धिक आधारशिला” पर बड़ा दांव लगा रही है। स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के लिए ₹4,821.21 करोड़ का आवंटन इस बात का संकेत है कि भारत अब केवल जेनेरिक दवाओं तक सीमित पहचान से आगे बढ़कर उच्च-स्तरीय नैदानिक नवाचार की दिशा में बढ़ना चाहता है।
एम्स, नई दिल्ली और पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ जैसे शीर्ष संस्थानों में भारी निवेश के माध्यम से बजट का उद्देश्य विशेषज्ञ शोध और प्रशिक्षण को देश की सीमाओं के भीतर सुदृढ़ करना है, ताकि लंबे समय से जारी “ब्रेन ड्रेन” की समस्या पर लगाम लगाई जा सके।
इसके साथ ही आयुष बजट में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर इसे ₹4,408.93 करोड़ करना पारंपरिक चिकित्सा को मुख्यधारा की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली से जोड़ने की रणनीतिक कोशिश है, जिससे तृतीयक स्वास्थ्य केंद्रों पर बढ़ते दबाव को कम किया जा सके।
सीमा शुल्क नीति: राहत का रास्ता
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के भाषण का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव “भाग-बी” कर सुधारों में दिखाई देता है। 17 आवश्यक कैंसर रोधी दवाओं पर पूर्ण सीमा शुल्क छूट उन भारी निजी खर्चों को कम करने की दिशा में बड़ा कदम है, जो हर वर्ष हजारों भारतीय परिवारों को गरीबी की ओर धकेल देते हैं।
विश्लेषण के लिहाज़ से यह केवल स्वास्थ्य लाभ नहीं, बल्कि “जीवन को आसान बनाने” की एक आर्थिक नीति है। सात और दुर्लभ रोगों के लिए शुल्क-मुक्त आयात की सुविधा और लोअर डिडक्शन सर्टिफिकेट (LDC) प्रक्रिया को स्वचालित बनाकर सरकार उस “प्रशासनिक बोझ” को कम करना चाहती है, जो गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों पर अतिरिक्त दबाव डालता है।
स्वास्थ्य को निर्यात में बदलने की रणनीति
बजट की सबसे रणनीतिक घोषणाओं में चिकित्सा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहनों का औपचारिक ढांचा शामिल है। मेडिकल वीज़ा प्रक्रियाओं को सरल बनाने और उच्च-स्तरीय विशेष उपचार प्रदान करने वाले संस्थानों को कर प्रोत्साहन देकर भारत को वैश्विक स्वास्थ्य सेवा केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश की गई है।
यह पहल फार्मास्यूटिकल्स विभाग के लिए निर्धारित ₹5,931.22 करोड़ के आवंटन के साथ मिलकर काम करेगी। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के ज़रिये देश में मेडिकल उपकरणों के निर्माण को बढ़ावा देना, सर्जरी की लागत कम करना और इस मूल्य लाभ के ज़रिये विदेशी मरीजों को आकर्षित करना—यही इस रणनीति का स्पष्ट लक्ष्य है।
निष्कर्ष: दिखावे से आगे की स्वास्थ्य नीति
वर्ष 2026 का बजट स्वास्थ्य क्षेत्र में “रिबन काटने” वाली राजनीति से आगे बढ़ता हुआ दिखाई देता है। इसका फोकस उन अदृश्य लागतों पर है—जैसे सीमा शुल्क, शोध की कमी और बीमा प्रीमियम—जो इलाज को महंगा बनाती हैं।
अब सफलता उस “विश्वास-आधारित प्रशासन” पर निर्भर करेगी, जिसका वादा वित्त मंत्री ने किया है। यदि स्वचालित कर प्रक्रियाएं और फार्मा प्रोत्साहन योजनाएं अपेक्षित परिणाम देती हैं, तो यह बजट खर्च की गई राशि के लिए नहीं, बल्कि जीवन बचाने की प्रक्रिया से आर्थिक बाधाओं को हटाने के लिए याद किया जाएगा।





