Last Updated on February 6, 2026 2:27 pm by BIZNAMA NEWS

देवसागर सिंह
भारत–अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे सवाल और संसद में हो रही तीखी प्रतिक्रियाएं यूं ही नहीं हैं। जिस समझौते को सरकार “ऐतिहासिक” बताने में जुटी है, वह अभी तक आधिकारिक रूप से हस्ताक्षरित नहीं हुआ है। इसी बीच केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने गुरुवार, 5 फरवरी को स्वीकार किया कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित नए व्यापार समझौते की “पहली किस्त” (First Tranche) पर मध्य मार्च तक हस्ताक्षर होने की संभावना है।
यह बयान जहां सरकार के आत्मविश्वास को दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट करता है कि समझौते के कई महत्वपूर्ण पहलू अभी भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किए गए हैं। यही वजह है कि विपक्ष इसे लेकर पारदर्शिता और राष्ट्रीय हितों के दृष्टिकोण से गंभीर चिंताएं जता रहा है।
मंत्री गोयल ने अमेरिका से लगभग 500 अरब डॉलर की खरीद प्रतिबद्धता को सही ठहराने की कोशिश की, जबकि पिछले वर्ष के आंकड़ों के अनुसार भारत का कुल आयात लगभग 750 अरब डॉलर के आसपास था। आलोचकों का कहना है कि कुल आयात के अनुपात में यह प्रतिबद्धता बहुत बड़ी है और इससे यह सवाल उठता है कि क्या भारत को अमेरिका के पक्ष में झुकने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
अपनी बात को मजबूत करने के लिए गोयल ने कथित रूप से कहा कि भारत की स्टील उत्पादन क्षमता वर्तमान में 140 मिलियन टन से बढ़कर आने वाले कुछ वर्षों में लगभग 300 मिलियन टन तक पहुंच जाएगी। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि जब यह आकलन किया गया कि अमेरिका से किन वस्तुओं की आवश्यकता होगी, तो यह अनुमान कम-से-कम 500 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
गोयल ने यह भी संकेत दिया कि भारत की बढ़ती विमानन जरूरतों के कारण बोइंग से 100 अरब डॉलर तक के विमान खरीदे जा सकते हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि यह व्यापार समझौता केवल वस्तुओं के आयात तक सीमित नहीं होगा, बल्कि रक्षा, ऊर्जा और विमानन जैसे क्षेत्रों में भी व्यापक असर डाल सकता है।
लेकिन गोयल के बयान में जिस पहलू पर सबसे ज्यादा अस्पष्टता रही, वह है कृषि और खाद्य व्यापार। यही क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील और राजनीतिक रूप से विस्फोटक माना जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार भारत ने अमेरिका के साथ कृषि एवं खाद्य उत्पादों में “सीमित व्यापार” पर सहमति जताई है। अमेरिकी वाणिज्य सचिव ने इसे अमेरिकी किसानों के लिए “गेम चेंजर” बताया है।
यह कथन अपने आप में चिंता पैदा करने वाला है, क्योंकि यदि यह अमेरिकी किसानों के लिए इतना लाभकारी है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि भारत के छोटे और सीमांत किसानों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
सरकार की ओर से यह आश्वासन जरूर दिया गया है कि भारतीय किसानों के हितों को नुकसान नहीं होने दिया जाएगा, लेकिन केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं। भारत में कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है। छोटे और सीमांत किसान पहले से ही लागत, मौसम और बाजार अस्थिरता से जूझ रहे हैं। ऐसे में यदि आयात बढ़ा और विदेशी उत्पादों की प्रतिस्पर्धा बढ़ी, तो भारतीय किसानों के लिए संकट गहरा सकता है।
जब तक समझौते की पूरी शर्तें सार्वजनिक नहीं होतीं, तब तक इस मुद्दे पर कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। व्यापार समझौतों में असली कहानी प्रेस विज्ञप्तियों में नहीं, बल्कि “फाइन प्रिंट” यानी लिखित शर्तों में छिपी होती है।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा है कि यह समझौता ऐसे “समझौते और रियायतें” लेकर आ सकता है, जिससे छोटे और सीमांत किसानों का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। उनका आरोप है कि सरकार बिना व्यापक चर्चा और विपक्ष को विश्वास में लिए इस दिशा में आगे बढ़ रही है।
जब संसद का सत्र चल रहा है, तब सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह विपक्ष को संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दों पर भरोसे में ले। व्यापार समझौते केवल आर्थिक आंकड़ों का खेल नहीं होते—वे घरेलू बाजार, किसान आय, रोजगार, खाद्य सुरक्षा और उद्योग प्रतिस्पर्धा को सीधे प्रभावित करते हैं।
भारत ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के गठन के बाद से लगातार कृषि व्यापार पर दबावों का सामना किया है, लेकिन उसने किसानों की संवेदनशील स्थिति को ध्यान में रखते हुए कई बार कठोर रुख अपनाया। अब यदि रिपोर्टों के अनुसार भारत कृषि और खाद्य उत्पादों में सीमित छूट देने जा रहा है, तो उसका निष्पक्ष मूल्यांकन आवश्यक है। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि संभावित नुकसान से बचाने के लिए सुरक्षात्मक प्रावधान और घरेलू स्तर पर राहत योजनाएं तैयार की जाएं।
भारत ने हाल के वर्षों में ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और अन्य देशों के साथ “ऐतिहासिक” व्यापार समझौते कर अपने व्यापार विकल्पों को व्यापक बनाया है। इससे भारत ने अपने व्यापारिक साझेदारों में विविधता लाई है और वैश्विक मंच पर अपनी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाई है। ऐसे में भारत के पास विकल्प हैं और उसे अपनी रणनीति का उपयोग समझदारी से करना चाहिए।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि अमेरिका के साथ भारत के व्यापार संबंध हमेशा स्थिर नहीं रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां कई बार अप्रत्याशित, कठोर और पूरी तरह लेन-देन आधारित रही हैं। उनका रवैया अक्सर दबाव और सौदेबाजी पर टिका रहा है। ऐसे में उनके सामने झुकना भारत के दीर्घकालिक हितों के अनुकूल नहीं हो सकता।
हालांकि सरकार यह दावा कर रही है कि समझौते के तहत शुल्क (टैरिफ) 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत तक आ जाएंगे और यह अंतरराष्ट्रीय तुलना में “सबसे बेहतर” होगा, फिर भी अत्यधिक सतर्कता जरूरी है। किसी भी समझौते की असली सफलता उसके वास्तविक कार्यान्वयन और संतुलित लाभ में होती है, न कि केवल राजनीतिक घोषणाओं में।
व्यापार कूटनीति में शीर्षक नहीं, शर्तें मायने रखती हैं। इसलिए जब तक यह समझौता पूरी तरह लिखित रूप में सामने नहीं आता और व्यावहारिक रूप से लागू नहीं होता, तब तक इसे “ऐतिहासिक उपलब्धि” मानकर उत्सव मनाना जल्दबाजी होगी।
भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह व्यापार समझौता केवल प्रतीकात्मक या राजनीतिक रूप से आकर्षक न बने, बल्कि आर्थिक रूप से संतुलित, रणनीतिक रूप से मजबूत और सामाजिक दृष्टि से सुरक्षित हो। उम्मीद की पहली किस्त जरूर दिख रही है, लेकिन शंकाओं की टोकरी अभी भी भारी है।





