
Last Updated on March 28, 2026 5:32 pm by BIZNAMA NEWS
लेखक: अंदलीब अख़्तर
मध्य पूर्व में ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव अब केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और खाद्य व्यवस्था पर भी पड़ने लगा है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (UNCTAD) की हालिया रिपोर्टों में चेतावनी दी गई है कि खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने दुनिया भर में कृषि आपूर्ति श्रृंखला, उर्वरक की उपलब्धता और खाद्य कीमतों पर गंभीर दबाव डालना शुरू कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा खिंचता है तो कई देशों में खाद्य असुरक्षा और महंगाई का खतरा काफी बढ़ सकता है।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य: वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा
होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। यह खाड़ी देशों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ता है और ऊर्जा व कच्चे माल की वैश्विक आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के लगभग 35 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति, वैश्विक उर्वरक व्यापार का लगभग 30 प्रतिशत और तरलीकृत प्राकृतिक गैस का एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है।
लेकिन मौजूदा तनाव के कारण इस मार्ग से जहाज़ों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार हाल के दिनों में इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में 90 से 95 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई है।
यह स्थिति वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजारों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है।
वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर मंडराता खतरा
FAO के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो ने चेतावनी दी है कि इस संकट का प्रभाव केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि कृषि उत्पादन और खाद्य आपूर्ति पर भी व्यापक असर पड़ेगा।
उनके अनुसार किसान इस समय दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, जबकि दूसरी ओर उर्वरक महंगे और कम उपलब्ध होते जा रहे हैं। खेती में ईंधन और उर्वरक दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए इनकी कीमतों में बढ़ोतरी सीधे कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि युद्ध जल्दी समाप्त हो जाता है तो वैश्विक बाजार लगभग तीन महीनों में स्थिर हो सकते हैं। लेकिन यदि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में संकट लंबे समय तक जारी रहता है, तो अगले कृषि मौसम में फसल उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है।
उर्वरक की कमी और कृषि संकट
UNCTAD की रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा संकट का सबसे बड़ा असर वैश्विक उर्वरक आपूर्ति पर पड़ रहा है। खास तौर पर नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों के उत्पादन में प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल होता है और इसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है।
समुद्री परिवहन में बाधा और ऊर्जा कीमतों में वृद्धि के कारण उर्वरक उत्पादन की लागत बढ़ रही है। इससे उर्वरकों की कीमतों में तेजी आने की आशंका है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसानों को समय पर पर्याप्त उर्वरक नहीं मिला तो फसल उत्पादन कम हो सकता है। इसका सीधा असर वैश्विक खाद्य आपूर्ति और कीमतों पर पड़ेगा।
वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता
मौजूदा संकट ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भी अस्थिरता पैदा कर दी है। कई शिपिंग कंपनियां जोखिम से बचने के लिए अपने मार्ग बदल रही हैं। इससे जहाजों की यात्रा लंबी हो रही है और परिवहन लागत बढ़ रही है।
इसका असर केवल व्यापारिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है बल्कि मानवीय सहायता कार्यों पर भी पड़ रहा है। राहत एजेंसियों के लिए खाद्य सामग्री और अन्य आवश्यक वस्तुओं को संकटग्रस्त क्षेत्रों तक पहुंचाना अधिक महंगा और धीमा हो गया है।
विकासशील देशों पर सबसे अधिक असर
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट का सबसे अधिक असर विकासशील और गरीब देशों पर पड़ेगा। श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों में इस समय धान की कटाई का मौसम चल रहा है और किसानों को उर्वरक तथा ईंधन की आवश्यकता है। यदि इनकी कीमतें बढ़ती हैं या आपूर्ति कम होती है तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
अफ्रीकी देशों के लिए भी स्थिति चिंताजनक है क्योंकि इनमें से कई देश उर्वरक के आयात पर निर्भर हैं। यदि उर्वरक महंगा या दुर्लभ हो गया तो वहां खाद्य उत्पादन में गिरावट आ सकती है।
इसके अलावा कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे बड़े खाद्य आयातक देशों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि मौजूदा परिस्थितियों में कई जहाज इस क्षेत्र में आने से बच रहे हैं।
बड़े निर्यातक देश भी प्रभावित
यह संकट केवल आयात करने वाले देशों तक सीमित नहीं रहेगा। अर्जेंटीना, ब्राज़ील और अमेरिका जैसे बड़े कृषि निर्यातक देशों की व्यापारिक गतिविधियां भी प्रभावित हो सकती हैं यदि वैश्विक परिवहन व्यवस्था में बाधा जारी रहती है।
इसके अलावा यदि तेल की कीमतें बहुत अधिक बढ़ जाती हैं तो कई देश बायोफ्यूल के उत्पादन को बढ़ावा दे सकते हैं। ऐसी स्थिति में खाद्य फसलों का इस्तेमाल ईंधन बनाने में होने लगेगा, जिससे खाद्य कीमतें और अधिक बढ़ सकती हैं।
प्रवासी मजदूरों की आय पर भी असर
खाड़ी देशों में दक्षिण एशिया और पूर्वी अफ्रीका के लाखों प्रवासी काम करते हैं। यदि युद्ध के कारण क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है तो इन मजदूरों की आय में कमी आ सकती है।
इससे उनके देशों को मिलने वाली विदेशी मुद्रा यानी रेमिटेंस पर भी असर पड़ सकता है, जो कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण स्रोत है।
संभावित समाधान और वैश्विक सहयोग
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर त्वरित और समन्वित कदम उठाने की जरूरत है। अल्पकालिक उपायों के रूप में देशों को वैकल्पिक समुद्री मार्गों की तलाश करनी होगी ताकि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति जारी रह सके।
मध्यम अवधि में उर्वरक आपूर्ति के स्रोतों को विविध बनाना, क्षेत्रीय भंडार प्रणाली को मजबूत करना और खाद्य निर्यात पर प्रतिबंध लगाने से बचना आवश्यक होगा।
दीर्घकालिक स्तर पर विशेषज्ञ यह भी सुझाव दे रहे हैं कि खाद्य प्रणालियों को ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र की तरह रणनीतिक महत्व दिया जाए और उनमें पर्याप्त निवेश किया जाए।
एक संवेदनशील वैश्विक स्थिति
मध्य पूर्व का यह संघर्ष दिखाता है कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था और खाद्य व्यवस्था कितनी गहराई से एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। किसी एक क्षेत्र में पैदा हुआ संकट पूरी दुनिया में खाद्य कीमतों, ऊर्जा बाजारों और व्यापारिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है।
यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए, तो यह संकट केवल आर्थिक समस्या नहीं रहेगा बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में खाद्य असुरक्षा और मानवीय संकट को जन्म दे सकता है। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं लगातार यह अपील कर रही हैं कि वैश्विक व्यापार मार्ग खुले रहें और इस संकट का समाधान कूटनीतिक प्रयासों से निकाला जाए।








