Last Updated on February 27, 2026 11:23 pm by BIZNAMA NEWS

AMN / NEW DELHI

भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) में वास्तविक आधार पर 7.6 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की है। यह आंकड़े 2022–23 को आधार वर्ष मानकर तैयार की गई राष्ट्रीय आय की नई श्रृंखला के तहत जारी द्वितीय अग्रिम अनुमान में सामने आए हैं। इससे भारत का दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का दर्जा बरकरार रहा है।

हालांकि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह मजबूत शीर्ष वृद्धि दर विभिन्न क्षेत्रों के बीच मौजूद असमानता को छिपाती है। जहां विनिर्माण और सेवा क्षेत्र वृद्धि को गति दे रहे हैं, वहीं कृषि और रोजगार-प्रधान गतिविधियां अब भी कमजोर बनी हुई हैं।

ये आंकड़े सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के माध्यम से जारी किए गए।


आधार वर्ष परिवर्तन से बदली वृद्धि की संरचना

2022–23 को नया आधार वर्ष बनाए जाने से सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की संरचना में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। नई श्रृंखला के अनुसार सकल स्थिर पूंजी निर्माण (GFCF) GDP का 31.7 प्रतिशत है, जबकि निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) की हिस्सेदारी 56.7 प्रतिशत है।

यह संकेत देता है कि अर्थव्यवस्था अब पहले की 2011–12 आधार वर्ष श्रृंखला की तुलना में अधिक निवेश-आधारित वृद्धि की ओर बढ़ रही है।

बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा कि नई श्रृंखला में निवेश की हिस्सेदारी अधिक और उपभोग की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम दिखाई दे रही है, जिससे वृद्धि की प्रकृति में बदलाव स्पष्ट है।

एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि लगातार दूसरे वर्ष सकल मूल्य वर्धन (GVA) की वृद्धि दर GDP से अधिक रही। FY26 में वास्तविक GDP 7.6 प्रतिशत बढ़ा, जबकि GVA 7.7 प्रतिशत बढ़ा। इससे संकेत मिलता है कि शुद्ध अप्रत्यक्ष करों का योगदान नकारात्मक रहा है।

नाममात्र GDP वृद्धि 8.6 प्रतिशत रही, जो दर्शाती है कि मजबूत वास्तविक वृद्धि के बावजूद राजस्व उछाल सीमित रहा।


कृषि क्षेत्र सबसे कमजोर कड़ी

कृषि और संबद्ध क्षेत्रों की वृद्धि दर FY26 में मात्र 2.4 प्रतिशत रही, जो समग्र GDP वृद्धि से काफी कम है। अक्टूबर–दिसंबर तिमाही (Q3) में कृषि वृद्धि लगभग 1.4 प्रतिशत तक धीमी पड़ गई, जबकि उसी अवधि में GDP 7.8 प्रतिशत बढ़ा।

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि रबी फसल के अंतिम आंकड़ों के बाद कुछ संशोधन संभव है, लेकिन संरचनात्मक रूप से कृषि क्षेत्र की वृद्धि कमजोर बनी हुई है। चूंकि देश की 40 प्रतिशत से अधिक कार्यबल कृषि पर निर्भर है, इसलिए यह ग्रामीण आय वृद्धि के लिए चिंता का विषय है।


विनिर्माण क्षेत्र ने दिखाई मजबूती, निर्माण में सुस्ती

FY26 में विनिर्माण क्षेत्र 11.5 प्रतिशत की दर से बढ़ा और यह समग्र वृद्धि का प्रमुख चालक रहा। बुनियादी ढांचे पर सरकारी व्यय, बेहतर क्षमता उपयोग और कॉर्पोरेट बैलेंस शीट में सुधार ने इस क्षेत्र को मजबूती दी है।

इसके विपरीत, निर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर घटकर 7.1 प्रतिशत रह गई, जो महामारी के बाद के वर्षों में दर्ज दो अंकों की वृद्धि से कम है। किफायती आवास खंड में सुस्ती इसका प्रमुख कारण माना जा रहा है, हालांकि मध्यम और प्रीमियम आवास श्रेणियों में मांग बनी रही।

निर्माण क्षेत्र का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह देश की कुल कार्यबल का लगभग 13 प्रतिशत रोजगार देता है।


सेवा क्षेत्र बना स्थिरता का आधार

सेवा क्षेत्र ने FY26 में 9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज कर स्थिरता प्रदान की। व्यापार, परिवहन, आतिथ्य, वित्त और रियल एस्टेट क्षेत्रों में 10 प्रतिशत के आसपास या उससे अधिक वृद्धि देखी गई, जो शहरी मांग और ऋण विस्तार की मजबूती को दर्शाती है।

हालांकि सार्वजनिक प्रशासन और रक्षा क्षेत्र की वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रही, जिसका कारण राज्यों के व्यय में कमी को माना जा रहा है।


महंगाई, राजकोषीय और मौद्रिक संकेत

FY26 में वास्तविक और नाममात्र GDP वृद्धि के बीच अंतर घटकर लगभग 1 प्रतिशत अंक रह गया, जो महंगाई के दबाव में नरमी का संकेत देता है।

हालांकि विशेषज्ञों का अनुमान है कि FY27 में यह अंतर फिर से बढ़ सकता है। नई आधार श्रृंखला के तहत अर्थव्यवस्था के आकार में कुछ संशोधन हुआ है, जिससे राजकोषीय घाटे का अनुपात पहले के अनुमान से थोड़ा अधिक दिख सकता है।

मौद्रिक नीति के दृष्टिकोण से, वर्तमान आंकड़े यह संकेत नहीं देते कि तत्काल दर कटौती की आवश्यकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, रिज़र्व बैंक आने वाले समय में सतर्क रुख बनाए रख सकता है।


FY27 का दृष्टिकोण

अधिकांश अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि FY27 में GDP वृद्धि लगभग 7 प्रतिशत के आसपास रह सकती है। विनिर्माण की गति, सेवा क्षेत्र की मजबूती और सार्वजनिक पूंजीगत व्यय इसमें सहायक होंगे।

हालांकि दीर्घकालिक स्थिरता के लिए कृषि और रोजगार-प्रधान क्षेत्रों में सुधार आवश्यक होगा। यदि इन क्षेत्रों में तेजी आती है, तभी वृद्धि अधिक समावेशी और मांग-आधारित बन सकेगी।


FY26 के आंकड़े दर्शाते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था तेज़ी से आगे बढ़ रही है, लेकिन वृद्धि का लाभ सभी क्षेत्रों तक समान रूप से नहीं पहुंच रहा। विनिर्माण और सेवाएं मजबूत हैं, जबकि कृषि और निर्माण पीछे हैं।

FY27 में नीति निर्माताओं के सामने चुनौती केवल उच्च वृद्धि बनाए रखने की नहीं, बल्कि उसे अधिक समावेशी और रोजगार सृजन करने वाली बनाने की होगी।

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