Last Updated on February 28, 2026 12:40 pm by BIZNAMA NEWS

आइए, इस होली पर संकल्प लें कि हम मर्यादा का उत्सव मनाएंगे, विभाजन नहीं विश्वास को बढ़ाएंगे, और उच्छृंखलता नहीं सद्भावपूर्ण उत्साह को अपनाएंगे। जब होली के रंग हमारे चरित्र और आचरण में उतरेंगे, तभी यह पर्व वास्तव में सार्थक और प्रेरणादायी बनेगा।


— ललित गर्ग

होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन की सजीव अभिव्यक्ति है। यह पर्व मनुष्य को अपने भीतर झांकने का निमंत्रण देता है और स्मरण कराता है कि जीवन की सच्ची सुंदरता बाहरी आडंबर में नहीं, बल्कि अंतःकरण की पवित्रता में निहित है। समय के साथ होली के स्वरूप में परिवर्तन आया है। कहीं यह प्रेम और सौहार्द का उत्सव बनी हुई है, तो कहीं दुर्भाग्यवश उच्छृंखलता से जुड़ गई है। छेड़छाड़, नशाखोरी, हिंसा और मर्यादा का उल्लंघन इस पावन पर्व की आत्मा के विपरीत हैं। वास्तविक अर्थों में होली मर्यादा-भंग नहीं, बल्कि मन की विकृतियों के दहन और संबंधों के नवीनीकरण का संदेश देती है। आज आवश्यकता है कि होली के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक आयामों को समझते हुए इसकी गरिमा को पुनर्स्थापित किया जाए।

होली की मूल प्रेरणा प्रह्लाद और होलिका की कथा से जुड़ी है। यह कथा केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि गहन प्रतीकात्मक संदेश है। प्रह्लाद अडिग आस्था और सत्य के प्रतीक हैं, जबकि होलिका अहंकार और हठ का रूप है। होलिका दहन यह सिखाता है कि अंततः सत्य की ही विजय होती है और अहंकार स्वयं भस्म हो जाता है। अग्नि प्रज्वलित करने का वास्तविक अर्थ लकड़ियों को जलाना नहीं, बल्कि अपने भीतर के क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और अभिमान का दहन करना है। यदि यह आंतरिक शुद्धि न हो, तो होली केवल सामाजिक आयोजन बनकर रह जाती है।

रंगों का आध्यात्मिक महत्व भी अत्यंत गहरा है। भारतीय संस्कृति में प्रत्येक रंग का अपना संदेश है—लाल ऊर्जा और प्रेम का प्रतीक है, पीला ज्ञान और पवित्रता का, हरा जीवन और समृद्धि का, तथा नीला अनंत आकाश और विस्तृत चेतना का द्योतक है। जब हम एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, तो प्रतीक रूप में भेदभाव मिटाकर एकता को स्वीकार करते हैं। जैसे इंद्रधनुष विभिन्न रंगों के मेल से बनता है, वैसे ही विविध समुदायों, विचारों और संस्कृतियों के सहअस्तित्व से एक समरस समाज निर्मित होता है। यही होली का सांस्कृतिक संदेश है—विविधता में एकता।

वैज्ञानिक दृष्टि से भी होली का विशेष महत्व है। यह फाल्गुन पूर्णिमा को मनाई जाती है, जो शीत ऋतु से ग्रीष्म ऋतु के संक्रमण का समय है। यह परिवर्तन शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता के लिए संवेदनशील होता है। परंपरागत रूप से होलिका की अग्नि के पास बैठना स्वास्थ्यवर्धक माना गया। प्राचीन काल में रंग टेसू के फूलों, चंदन, हल्दी और औषधीय गुलाल से बनाए जाते थे, जिनमें रोगनिरोधी गुण होते थे। आज रासायनिक रंगों के दुष्प्रभाव इस परंपरा को चुनौती दे रहे हैं। इसलिए प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों की ओर लौटना समय की मांग है। स्वच्छता, हरित जीवनशैली और पर्यावरण-संवेदनशीलता का विचार होली की मूल भावना से पूर्णतः मेल खाता है।

सांस्कृतिक रूप से होली भारतीय समाज की सामूहिक चेतना का उत्सव है। यह वह अवसर है जब सामाजिक दूरी कम होती है और अपनत्व का भाव गहरा होता है। गांवों में लोकगीतों की गूंज और शहरों में सांस्कृतिक कार्यक्रम सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करते हैं। यह पर्व पुराने मनमुटाव भुलाकर नए सिरे से गले मिलने का अवसर देता है। यदि इसकी आत्मा को समझा जाए, तो होली संवाद और सौहार्द का सेतु बन सकती है।

होली का सबसे मनोहारी स्वरूप श्रीकृष्ण और राधा की ब्रज लीला में दिखाई देता है। वृंदावन और मथुरा की होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि दिव्य प्रेम और भक्ति का प्रतीक है। यहां रंग आत्मा और परमात्मा के मिलन के आनंद का प्रतीक बन जाते हैं। श्रीकृष्ण द्वारा राधा पर रंग डालना अहंकार के लय और निष्कलुष प्रेम की अभिव्यक्ति है। यह परंपरा सिखाती है कि प्रेम सभी भेद मिटाकर संबंधों को आध्यात्मिक ऊंचाई देता है।

वैश्वीकरण के इस दौर में आधुनिकता को अक्सर प्रगति का पर्याय माना जाता है। आधुनिकता स्वागतयोग्य है, परंतु यदि वह मूल्यों का क्षरण करे, तो सामाजिक संतुलन बिगड़ता है। “बुरा न मानो, होली है” का अर्थ किसी की गरिमा को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और स्नेह के साथ आनंद बांटना है। नारी-सम्मान, सामाजिक मर्यादा और जिम्मेदारी का पालन करते हुए होली मनाना ही सच्ची भारतीयता है। आनंद और अनुशासन परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

आज तकनीकी प्रगति के साथ मानसिक तनाव और सामाजिक अलगाव भी बढ़ा है। डिजिटल युग में आभासी संवाद अधिक और व्यक्तिगत संपर्क कम होता जा रहा है। ऐसे समय में होली आमने-सामने मिलकर स्नेह प्रकट करने और सामूहिक उल्लास का अवसर देती है। यदि हम निर्धनों, वृद्धों और जरूरतमंदों के साथ रंग और खुशियां साझा करें, तो यह करुणा का माध्यम भी बन सकती है। विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और धार्मिक संगठनों को चाहिए कि वे नशामुक्त, पर्यावरण-अनुकूल और मर्यादित होली का संदेश प्रसारित करें। लोकगीत, कवि-सम्मेलन, सांस्कृतिक आयोजन और सामूहिक प्रार्थनाएं इस पर्व को नई दिशा दे सकते हैं।

अंततः होली सिखाती है कि बाहरी रंग फीके पड़ जाते हैं, परंतु भीतर का प्रेम और सौहार्द स्थायी रहता है। यदि हम अपने अहंकार को जला दें और हृदय को करुणा से भर लें, तो प्रत्येक दिन होली बन सकता है। जब आर्थिक प्रगति के साथ सांस्कृतिक चेतना भी आगे बढ़ेगी, तभी सच्चे अर्थों में समृद्ध भारत का स्वप्न साकार होगा। आइए, इस होली पर संकल्प लें कि हम मर्यादा का उत्सव मनाएंगे, विभाजन नहीं विश्वास को बढ़ाएंगे, और उच्छृंखलता नहीं सद्भावपूर्ण उत्साह को अपनाएंगे। जब होली के रंग हमारे चरित्र और आचरण में उतरेंगे, तभी यह पर्व वास्तव में सार्थक और प्रेरणादायी बनेगा।

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